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पाप पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas on Sin with Hindi Meaning

पाप पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit Shlokas on Sin with Hindi Meaning


पाप पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

एक: पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजन: ।

भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते।।

हिंदी अर्थ: मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं ; पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।


अष्टादस पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयम्।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।

हिंदी अर्थ:- अठारह पुराणों में व्यास के दो वचन ही है। पहला परोपकार ही पुण्य है और दूसरा औरों को दुःख पहुंचाना पाप है।


बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।

हिंदी अर्थ:- समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।


दुष्कृतं हि मनुष्याणां अन्नमाश्रित्य तिष्ठति।

अश्नाति यो हि यस्यान्नं स तस्याश्नाति किल्बिषम्।।

हिंदी अर्थ- मनुष्य के दुष्कृत्य या पाप उसके अन्न में रहते हैं। जो जिसका अन्न खाता है। वह उसके पाप को भी खाता है।


अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात प्रतिनिवर्तते।

स दत्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति।।

हिंदी अर्थ- जिस व्यक्ति के दरवाजे से अतिथि बिना संतुष्ट हुए चला जाता है। वह उसके पुण्य ले जाता है और अपने पाप उसे दे जाता है।


मातरं पितरं विप्रमाचार्यं चावमन्यते।

स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः।।

हिंदी अर्थ- जो व्यक्ति माता पिता ब्राम्हण और गुरु का अपमान करता है। वह यमराज के वश में होकर उस पाप का फल भोगता है।


धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन पापं प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन।

शत्रुर्विनश्यति धनंजयकीर्तनेन माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगाः।।

हिंदी अर्थ– युधिष्ठिर का नाम लेने से धर्म बढ़ता है। भीम के नाम से पाप नष्ट होता है। अर्जुन का नाम लेने से शत्रुओं का नाश होता है और नकुल-सहदेव का नाम लेने से रोगों का नाश होता है।


प्रातःस्नानं चरित्वाथ शुद्धे तीर्थे विशेषतः।

प्रातःस्नानाद्यतः शुद्ध्येत् कायो अयं मलिनः सदा।।

नोपसर्पन्ति वै दुष्टाः प्रातःस्नायिजनं क्वचित्।

दृष्टादृष्टफलं तस्मात् प्रातःस्नानं समाचरेत्।।

हिंदी अर्थ– शुद्ध तीर्थ में सुबह ही स्नान करना चाहिए। यह मलपूर्ण शरीर शुद्ध तीर्थ में स्नान करने से शुद्ध होता है। प्रातः काल स्नान करने वाले के पास भूत प्रेत आदि दुष्ट नहीं आते। इस तरह दिखाई देने वाले फल जैसे शरीर की स्वच्छता और न् दिखाई देने वाले फल जैसे पाप नाश तथा पुण्य की प्राप्ति। ये दोनों प्रकार के फल प्रातः स्नान करने वाले को मिलते हैं।


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्,

भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!

हिंदी अर्थ:- हम सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा का ध्यान करते हैं, परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें। प्रभु आप ही इस सृष्टि के निर्माता हो, आप ही हम सब के दुःख हरने वाले हो, हमारे प्राणों के आधार हे परम पिता परमेश्वर, सृष्टि निर्माता मैंने आपका वर्ण कर रहा हूं। यानि उस प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुख स्वरुप श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देव स्वरुप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। परमात्मा हमारी बुद्धि को सत्मार्ग पर प्रेरित करें।

हे परम पिता परमेश्वर मैं आपसे यही प्रार्थना करता हूं कि मुझे सदबुद्धि देना और हमेशा सही मार्ग पर चलता रहूं।


अष्टादशपुराणानां सारं व्यासेन कीर्तितम् |

परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

हिंदी अर्थ:- कीर्तिस्वरूप अठारह पुराणों के सार के रूप में महर्षि व्यास ने सिर्फ दो बातें कहीं !! दूसरो का उपकार करने से पुण्य होता है और दुःख देने से पाप । एक प्रचलित कहावत भी है -परहित सरिस धरम नहि भाई, परपीड़ा सम नहि अधिकाई ।


अस्तयभाषणं पापं वर्तते ॥

हिंदी अर्थ :- झूठ बोलना पाप है ।


मैत्री करूणा मुदितोपेक्षाणां।

सुख दु:ख पुण्यापुण्य विषयाणां।

भावनातश्चित्तप्रासादनम्।

हिंदी अर्थ:- आनंदमयता, दूसरे का दु:ख देखकर मन में करूणा, दूसरे का पुण्य तथा अच्छे कर्म समाज सेवा आदि देखकर आनंद का भाव, तथा किसी ने पाप कर्म किया तो मन में उपेक्षा का भाव 'किया होगा छोडो' आदि प्रातिक्रियाएँ उत्पन्न होनी चाहिए।


यमो वैवस्वतो राजा यस्तवैष )दि स्थित: ।

तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून् व्राज ॥

हिंदी अर्थ:- यदि विवस्वत के पुत्र भगवान यम आपाके मन म्ंो बसते है तथा उनसे आपका मत भेद नही है तो आपको अपने पाप धोने परम पवित्र गंगा नदी के तट पर या कुरूओंके भूमी को जाने की कोइ आवश्यकता नही है ।


मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते ।

यदा च पच्यते पापं दु:खं चाथ निगच्छति धम्मपद ||

हिंदी अर्थ:- जब तक पाप संपूर्ण रूप से फलित नही होता तब तक वह पाप कर्म मधुर लगता है । परन्तु पूर्णत: फलित होने के पश्च्यात मनुष्य को उसके कटु परिणाम सहन करने ही पडते है ।


त्यजेत् क्षुधार्ता जननी स्वपुत्रं , खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् ।

बुभुक्षित: किं न करोति पापं , क्षीणा जना निष्करूणा भवन्ति ॥

हिंदी अर्थ:- भूख से व्याकूल माता अपने पुत्रका त्याग करेगी भूख से व्याकूल साँप अपने अण्डे खा लेगा भूखा क्या पाप नहीं कर सकता ? भूख से क्षीण लोग निर्दय बन जाते हैं ।


अन्यक्षेत्रे कॄतं पापं पुण्यक्षेत्रे विनश्यति ।

पुण्यक्षेत्रे कॄतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥

हिंदी अर्थ:- अन्यक्षेत्र में किए पाप पुण्य क्षेत्र में धुल जाते है । पर पुण्य क्षेत्र में किए पाप तो वज्रलेप की तरह होते है


एक: पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजन: ।

भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते।।

हिंदी अर्थ: मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं; पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।


एक: पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजन: ।

भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते।।

हिंदी अर्थ: मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं; पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।


ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥

हिंदी अर्थ:- जब मनुष्य के भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय-इस त्रिपुटी से “कर्मप्रेरणा” अर्थात् कर्म करने में प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मुझे अमुक फल मिलेगा।

कर्म प्रेरणा होने से कर्ता, करण और कर्म-इनसे “कर्मसंग्रह” अर्थात् पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म का संग्रह होता है। यदि कर्म संग्रह न हो तो कर्म बाँधने वाला नहीं होता, केवल क्रिया मात्र होती है।


श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

हिंदी अर्थ:- करोड़ों ग्रंथों में जो बात कही गई है वो आधी लाइन में कहता हूं, दूसरे का भला करना ही सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरे को दुःख देना सबसे बड़ा पाप.


जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं !

मानोन्नतिं दिशति पापमपा करोति !!

हिन्दी अर्थ : अच्छे दोस्तों का साथ बुद्धि की जटिलता को हर लेता है, हमारी बोली सच बोलने लगती है, इससे मान और उन्नति बढती है और पाप मिट जाते है.


पापं वर्धयते चिनोति कुमतिं कीर्त्यंगना नश्यति

धर्मं ध्वंसयते तनोति विपदं सम्पत्तिमुन्मर्दति ।

नीतिं हन्ति विनीतिमत्र कुरुते कोपं धुनीते शमम्किं

वा दुर्जन संगतिं न कुरुते लोकद्वयध्वंसिनी ॥

हिंदी अर्थ:- पाप को बढाती है, कुमति का संचार करती है, कीर्तिरुप अंगना का नाश करती है, धर्म का ध्वंस करती है, विपत्ति का विस्तार करती है, संपत्ति का मर्दन करती है, नीति को हरती है, विनीति को कोप कराती है, शांति को हिलाती है; दोनों लोक का नाश करनेवाली दुर्जन-संगति क्या नहीं करती ?


लोभमूलानि पापानि ।

हिंदी अर्थ:- सभी पाप का मूल लोभ है ।


पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।

आपदगतं च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।।

हिंदी अर्थ : उत्तम मित्र अपने भित्र को पापों से दूर करता है, हित भलाई. के कार्यों में लगाता है, उसकी गुप्त बातों को छिपाता है, गुणों को दर्शाता है प्रकट करता है, आपत्ति पड़ने पर साथ नहीं छोड़ता, समय पड़ने पर सहायता करता है। महान् पुरुषों ने अच्छे मित्र के यही लक्षण बताये हैं।


सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ।।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैब पापमवाप्स्यसि।।

हिंदी अर्थ : हे अर्जुन! सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जीत-हार आदि सभी को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। तुम को पाप नहीं लगेगा अर्थात् पापी नहीं कहलाओगे।


कुपात्र दानात् च भवेत् दरिद्रो

दारिद्र्य दोषेण करोति पापम् ।

पापप्रभावात् नरकं प्रयाति

पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी ॥

हिंदी अर्थ:- कुपात्र को दान देने से दरिद्री बनता है । दारिद्र्य दोष से पाप होता है । पाप के प्रभाव से नरक में जाता है; फिर से दरिद्री और फिर से पाप होता है ।


सुखदुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

तो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।

अर्थातः तुम या सुख दुख, हानि या लाभ, विजय या पराजय का विचार किए बिना युद्ध के लिए युद्ध करो। ऐसा करने पर तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।


अथ चेत्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि

ततः स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

अर्थातः किंतु यदि तुम युद्ध करने के स्वधर्म को सम्पन्न नहीं रते तो तुम्हें निश्चित रूप से अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने का पाप लगेगा और तुम योद्धा के रूप में अपना यश खो दोगे।


न पूण्य न पाप न सोख्य न दुःख न मंत्रो न तीर्थ न वेदों न यज्ञ

अहं भोजन नैव भोज्य न भोक्ता चिदानन्द रूप शिवोह शिवोहम!!!

हिंदी अर्थ – न मैं पूण्य हूँ, न मैं पाप हूँ, न सुख और न दुःख, न मंत्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनन्द हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ!!


धर्मस्य फलमिच्छन्ति धर्मं नेच्छन्ति मानवाः ।

फलं पापस्य नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति सादराः ॥

हिंदी अर्थ:- लोगों को धर्म का फल चाहिए, पर धर्म का आचरण नहि ! और पाप का फल नहि चाहिए, पर गर्व से पापाचरण करना है !


अन्यस्थाने कृतं पापं धर्मस्थाने विमुच्यते ।

धर्मस्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥

हिंदी अर्थ:- अन्य जगहों पे किये हुए पापों से धर्मस्थान में मुक्ति मिलती है, पर धर्मस्थान में किया हुआ पाप वज्रलेप बनता है ।


धर्मस्य फलमिच्छन्ति धर्मं नेच्छन्ति मानवाः ।

फलं पापस्य नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति सादराः ॥

हिंदी अर्थ:- लोगों को धर्म का फल चाहिए, पर धर्म का आचरण नहि ! और पाप का फल नहि चाहिए, पर गर्व से पापाचरण करना है !


अन्यस्थाने कृतं पापं धर्मस्थाने विमुच्यते ।

धर्मस्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥

हिंदी अर्थ:- अन्य जगहों पे किये हुए पापों से धर्मस्थान में मुक्ति मिलती है, पर धर्मस्थान में किया हुआ पाप वज्रलेप बनता है ।


राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।

भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पापं गुरस्था॥

हिंदी अर्थ:- राष्ट्र के अहित का जिम्मेदार राजा का पाप होता है, राजा के पाप का जिम्मेदार उसका पुरोहित (मन्त्रीगण) होता है, स्त्री के गलत कार्य का जिम्मेदार उसका पति होता है और शिष्य के पाप का जिम्मेदार गुरु होता है।


जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।

चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥

हिंदी अर्थ:- उत्तम मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता है। हमारी वाणी में सत्यता आती है। हमारा मान-सम्मान बढ़ता है। हम पापकर्म से मुक्त होते हैं। हमारा मन प्रसन्न होता है, और हमारा यश चारों दिशाओं में फैलता है। उत्तम और श्रेष्ठ मित्रों की संगति से मानव का हर प्रकार से कल्याण होता है।


कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

हिंदी अर्थ:- कुल के नाश से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत

फैल जाता है।


पापान्निवारयति योजयते हिताय

गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले

सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥

हिंदी अर्थ:- जो पाप से रोकता है, हित में जोडता है, गुप्त बात गुप्त रखता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति आने पर छोडता नहीं, समय आने पर (जो आवश्यक हो) देता है - संत पुरुष इन्हीं को सन्मित्र के लक्षण कहते हैं।


योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया |

स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ||

यो बन्धनवधक्लेशान्प्राणीनां न चिकीर्षति |

स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते || (मनुस्मृति ५.२३ )

अर्थात् शास्त्रों में लिखा है कि पशुओं की या जीवों की हत्या करने वाला पापी होता है तथा उसे इसका फल अवश्य ही मिलता है |जो व्यक्ति अपने सुख की इच्छा से अहिंसक जीवों को मारता है ,वह इस जीवन में तथा जन्मान्तर में कहीं भी सुख नहीं पाता और जो जीवों को बांधने - मारने या क्लेश देने की इच्छा नहीं करता वह जीवों का हित चाहने वाला अत्यन्त सुख पाता है | अर्थात जीवों की हिंसा न करने वाला ,अच्छे फल प्राप्त करता है तथा जीवों की हिंसा केवल अपने हित के लिये करने वाला व्यक्ति ,सदा ही दुःख भोगता है |


अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी |

संसकर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेतिघातकाः ||

स्वमासं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति |

अनभ्यर्च्य पितृन्देवांस्ततोऽन्यो नास्त्यपुण्यकृत || (५.२६)

हिंदी अर्थ:- ऋषि बताते हैं कि किसी भी प्राणी की हत्या सबसे बड़ा पाप है |जो यह पाप करता है उसे इसका फल अवश्य ही मिलता है |जो व्यक्ति पशु या जीव की हत्या या वध की आज्ञा देता है ,तथा उसका खण्ड खण्ड करने वाला ,उसे मारणे वाला उसे मारकर बेचने वाला ,उसे खरीदने वाला ,उसे पकाने वाला ,उसे परोसने वाला उसे खाने वाला -ये सभी व्यक्ति घातक माने जाते हैं |जो व्यक्ति देवता और पितरों का पूजन किये बिना ही दूसरे जीवों कसा मांस खाते हैं ,तथा स्वयं अपनी सेहत बनाते हैं उससे बढ़ कर पापी दूसरा नहीम् होता है ,अतः पशुओं को मारणे की आज्ञा देने वाले से लेकर उसे पकाकर खाने वाले तक सभी व्यक्ति पापी होते हैं , वे सभी लोग पशु हिंसा के पाप में शामिल होते हैं |


मांस भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् |

एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः||

न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने |

प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला || ( ५.२८ )

हिंदी अर्थ:- ऋषियों के अनुसार जो व्यक्ति मांस खाता है ,उसे इसका फल अवश्य मिलता है |महान पण्डित कहते हैं कि जो व्यक्ति जिसका मांस खाता है ,वह परलोक में उस व्यक्ति को अवश्य ही खायेगा ,यही मांस का मांसत्व होता है | ऋषि कहते हैं कि मांस खाने ,मद्य पीने ,और स्त्री-प्रसङ्ग करने में दोष नहीं है क्योंकि प्राणियों की प्रवृत्ति ही ऎसी होती है , परन्तु उससे निवृत्त होना महाफलदायी होता है |अतः इनमें कोई पाप नहीं है , परन्तु नियमों के विरुद्ध जाकर इन्हें करना पाप है |


जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं ,

मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति ।

चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं ,

सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ।। २३ ।।

अर्थ:- सत्संगति, बुद्धि की जड़ता को हरती है, वाणी में सत्य सींचती है, सम्मान की वृद्धि करती है, पापों को दूर करती है, चित्त को प्रसन्न करती है और दशों दिशाओं में कीर्ति को फैलाती है । कहो, सत्संगति मनुष्य में क्या नहीं करती ?


असन्तो नाभ्यर्थाः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः ।

प्रिया न्यायया वृत्ति र्मलिनमसभंगेऽप्यसुकरम्।।

विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महताम्।

सतां केनोद्रिष्टं विषमसिधाराव्रत मिदम् ॥ २८ ॥

अर्थ:- सत्पुरुष दुष्टों से याचना नहीं करते, थोड़े धन वाले मित्रों से भी कुछ नहीं मांगते, न्याय की जीविका से संतुष्ट रहते हैं, प्राणों पर बन आने पर भी पाप कर्म नहीं करते, विषाद काल में वे ऊँचे बने रहते हैं यानी घबराते नहीं औरमहत पुरुषों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं । इस तलवार की धार के सामान कठिन व्रत का उपदेश उन्हें किसने दिया ? किसी ने नहीं, वे स्वभाव से ही ऐसे होते हैं । मतलब ये है कि सत्पुरुषों में उपरोक्त गुण किसी केसिखाने से नहीं आते, उनमें ये सब गुण स्वभाव से या पैदाइशी होते हैं ।


लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः

सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् ।

सौजन्यं यदि किं गुणैः स्वमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः

सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ।। ५५ ।।

अर्थ:- यदि लोभ है तो और गुणों की जरुरत ? यदि परनिन्दा या चुगलखोरी है, तो और पापों की क्या आवश्यकता ? यदि सत्य है, तो तपस्या से क्या प्रयोजन ? यदि मन शुद्ध है तो तीर्थों से क्या लाभ ? यदि सज्जनता है तो गुणों की क्या जरुरत ? यदि कीर्ति है तो आभूषणों की क्या आवश्यकता ? यदि उत्तम विद्या है तो धन का क्या प्रयोजन ? यदि अपयश है तो मृत्यु से और क्या होगा ?


अगम्यान्यः पुमान्याति, असेव्यांशृ नीपेवते ।

स मृत्युमुपगृहणाति, गर्भमश्वतरी यथा ।।

हिंदी अर्थ:- जो अगम्या स्त्री से गमन करता है, जो सेवा न करने योग्य की सेवा करता है, वह उसी तरह मरता है, जिस तरह खच्चरी गर्भ धारण करने से मरती है । दुर्योधन दुष्टों का सरदार और बुराइयों कि खान था, वह किसी नीति- नियम को न मानता था । जो मन में आता वही करता था । पूर्वजन्म के पापों से घोर दुराचारी था । दैव के अनुकूल होने से लक्ष्मी मिल गयी थी; परन्तु पाण्डवों के उत्तमोत्तम गुणों से वह अहर्निश जला करता था । उसकी सेवा करने से गोगृह में भीष्म को अपमानित होना पड़ा और द्रोणाचार्य को भी नीचे देखना पड़ा । भरी सभा में अन्यायाचरण देख कर भी, चाकरी के कारण, भीष्म और द्रोण कुछ न बोल सके । बहुत क्या, शेष में उन्हें अपने प्राण भी गवाने पड़े ।


अपूजितोऽतिथिर्यस्य गृहाद्याति विनिःश्वसन् ।

गच्छन्ति विमुखास्तस्य पितृभिःसह देवताः ।।

हिंदी अर्थ:-  जिसके घर में अपोजिट अतिथि सांस लेता हुआ चला जाता है, उसके यहाँ देवता पितरों सहित-विमुख होकर चले जाते हैं । अगर गृहस्थ सूर्य डूबने के पश्चात आये हुए अतिथि की सेवा करता है, तो वह देवता होता है -"आइये" कहने से अग्नि, आसान देने से इन्द्र, चरण धोने से पितर और अर्घ देने से शिव जी प्रसन्न होते हैं ।देखिये, वृक्ष अपने काटने वाले के सर पर भी छाया करता है । घर आये हुए बालक, वृद्ध, युवा सभी की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि अभ्यागत सबका गुरु होता है । जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है, वह अपने किये पाप उसे देकर उसका पुण्य ले जाता है ।


यस्माच्च येन च यदा च यथाच यच्च।

यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म।।

तस्माच्च तेन च तदा च तथा च तच्च।

तावच्च तत्र च कृतान्तवशादुपैति ।।

हिंदी अर्थ:- जिसने, जिस वजह से, जब, जैसा, जो, जितना और जहाँ शुभ और अशुभ कर्म किया है; उसे उसी से, तभी, तैसा ही, सो, उतना ही और वहां ही, काल की प्रेरणा से, फल मिलता है । इन प्रमाणों से स्पष्ट समझ में आ सकता है कि, मनुष्य अपने कर्मो से बन्धन में फसकर दुःख और सुख भोगता है । जो लोग दुःख सुख को मनुष्य या परमात्माकृत समझते हैं, वे बड़ी भारी गलती करते हैं । जिस समय पिटारी वाले सर्प के पापों का उदय हुआ, वह पिटारी में बन्द हुआ । जब तक पापों का अन्त न हुआ, वह भूख प्यास से कष्ट पाता रहा । ज्यों ही पुण्यों का उदय हुआ, दैव की प्रेरणा से, चूहा उसके पिटारे में छेद करके घुसा। उससे सर्प की क्षुधा शान्त हुई और वह उसी छेद की राह से निकल कर स्वतंत्र भी हो गया । इसी तरह मनुष्य भी दैव के अधीन होकर सुख भोगते हैं ।


पत्रं नैव यदा करीर विटपे दोषो वसन्तस्य किं

नोलुकोऽप्यव्लोकते यदि दिवा सूरस्य किं दूषणम् ।

धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्

यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तत् मार्जितुः कः क्षमः ।। ९४ ।।

हिंदी अर्थ:- अगर करील के पेड़ में पत्ते नहीं लगते तो इसमें बसंत का क्या दोष है ? अगर उल्लू को दिन में नहीं सूझता, तो इसमें सूर्य का क्या दोष है ? अगर पापहीये के मुख में जल-धारा नहीं गिरती, तो इसमें मेघ का क्या दोष है ? विधाता ने जो कुछ भाग्य में लिख दिया है, उसे कोई भी मिटा नहीं सकता ।


वाक्यवाण नहि छोड़िये तीच्छनतायुत जोय।

कटुक वचन कुरुकुल हन्यो, भीम क्रोधवस होय।।

नाहिं विवाद मदान्ध सों, करै न पर पै खीस।

तुरुष वचन सों कृष्ण ने, काट्यो चेदिप सीस।।

हिंदी अर्थ:- महापुरुष, भूल से भी, किसी का दिल दुखने वाली बात नहीं कहते; क्योंकि वे पराया दिल दुखने को ही सबसे बड़ा पाप समझते हैं । इतना ही नहीं, महापुरुष अपने तईं गाली देने वाले को भी गाली नहीं देते; क्योंकि उनके पास कठोर वचन या गाली होती ही नहीं, दें कहाँ से ? जिनके पास जिस चीज़ का अभाव होगा, वह उसे कहाँ से देगा ?


मित्रता पर संस्कृत श्लोक 💐😊

जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं !

मानोन्नतिं दिशति पापमपा करोति !!

हिंदी अर्थ:- अच्छे मित्रों का साथ बुद्धि की जटिलता को हर लेता है, हमारी बोली सच बोलने लगती है, इससे मान और उन्नति बढती है और पाप मिट जाते है|


जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं,

मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति |

चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,

सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ||

अर्थात्: अच्छे मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता है,वाणी में सत्य का संचार करता है, मान और उन्नति को बढ़ाता है और पाप से मुक्त करता है | चित्त को प्रसन्न करता है और ( हमारी )कीर्ति को सभी दिशाओं में फैलाता है |(आप ही ) कहें कि सत्संगतिः मनुष्यों का कौन सा भला नहीं करती |


तुलसी के पीछे पाप से हरी चर्चा न सुहाय

जैसे स्वर के वेग से भूख विदा हो जाए। ।

हिंदी अर्थ:- तुलसीदास जी कहते हैं पिछली बड़ी भूलों के कारण उन्नति के लिए की गई चर्चा उसी प्रकार नहीं सुहाती जिस प्रकार बुखार के रोगी की खाने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है।


मानोन्नति- दिशति पापमपाकरोत ।

सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ||

अर्थात्: अच्छे मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता है ,वाणी में सत्य का संचार करता है, मान और उन्नति को बढ़ाता है और पाप से मुक्त करता है | चित्त को प्रसन्न करता है और कीर्ति को सभी दिशाओं में फैलाता है |(आप ही ) कहें कि सत्संगतिः मनुष्यों का कौन सा भला नहीं करती |


अष्टादस पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयम् ।

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

अर्थात्: अट्ठारह पुराणों में व्यास के दो ही वचन हैं “परोपकार ही पुण्य है” और “दूसरों को दुःख देना पाप है”


न हि नाशोऽस्ति वार्ष्णेय कर्मणोः शुभपापयोः ।

हिंदी अर्थ:- किये गये अच्छे और बुरे कर्मों का नाश, उनका भोग(फल) मिले बिना नहीं होता।।


यत् कृतं स्याच्छुभं कर्मं पापं वा यदि वाश्नुते।

तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्भिः।।

हिंदी अर्थ:- मनुष्य जो भी अच्छे-बुरे कर्म करता है। उनका फल उसे भोगना पड़ता है इसीलिए मन, बुद्धि और शरीर से सदा अच्छे कर्म करने चाहिए।।


शुभैः प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रेर्मानुषो भवेत्।

मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्विषी।।

हिंदी अर्थ:- अच्छे कर्म करने से जीव को देव योनि मिलती है जीव अच्छे और बुरे कर्म करने से मनुष्य योनि में मोह में डालने वाले तामसिक कर्म करने से पशु पक्षी योनियों में तथा पाप कर्म करने से नरक में जाता है।


इह क्षेत्रे क्रियते पार्थ कार्यं न वैकिंचित् क्रियते प्रेत्यकार्यम्।।

हिंदी अर्थ:- इसी शरीर के रहते पाप-पुण्य कर्म किए जा सकते हैं मरने के बाद कोई कर्म नहीं किया जा सकता।


न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा ।

मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृत दुष्कृतैः।।

हिंदी अर्थ:- पिता के कर्म से पुत्र का और पुत्र के कर्म से पिता का कोई संबंध नहीं है । जीव अपने - अपने पाप - पुण्य कर्मों के बंधन में बंधे हुए अलग अलग रास्तों से अपने कर्मों के अनुसार जाते हैं।


नायं परस्य सुकृतं दुष्कृतं चापि सेवते ।

करोति यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते।।

हिंदी अर्थ:- जीवात्मा किसी दूसरे के पाप और पुण्य कर्मों का फल नहीं भोगता अपितु वह जैसे कर्म करता है उसके अनुसार उसे भोग मिलता है।


शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा।

कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित्।।

हिंदी अर्थ:- अच्छे कर्म करने से सुख और पाप कर्म करने से दुःख मिलता है। अपना किया हुआ कर्म सब जगह फल देता है। बिना किए हुए कर्मों का फल कभी नहीं भोगा जाता। पुण्यान् पुण्यकृतो यान्ति पापान् पापकृतो नराः ।


हिंदी अर्थ:- पुण्य कर्म करने वाले जीव पुण्यलोकों में और पाप कर्म करने वाले मनुष्य पापमय लोकों में जाते हैं।


शुभकृच्छभयोनीषु पापकृत् पापयोनीषु।।

हिंदी अर्थ:- अच्छे कर्म करने वाला प्राणी अच्छी योनियों में और पाप कर्म करने वाला प्राणी पाप योनियों में जन्म लेता है।


अपहाय निजं कर्म कृष्णकृष्णोति वादिनः ।

ते हरेर्दृषिनः पापाः धर्मार्थ जन्म यध्धरेः ॥

हिंदी अर्थ:- जो लोग अपना कर्म छोडकर केवल कृष्ण कृष्ण बोलते रहते हैं, वे हरि के द्वेषी हैं ।


ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

हिंदी अर्थ:- जो आसक्तिरहित और ब्रह्मार्पण वृत्ति से कर्म करते हैं, वे पानी से अलिप्त रहनेवाले कमल की तरह पाप से अलिप्त रहते हैं।


पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।

आपदगतं च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।।|

हिंदी अर्थ:- उत्तम मित्र अपने भित्र को पापों से दूर करता है, हित भलाई. के कार्यों में लगाता है, उसकी गुप्त बातों को छिपाता है, गुणों को दर्शाता है प्रकट करता है., आपत्ति पड़ने पर साथ नहीं छोड़ता, समय पड़ने पर सहायता

करता है। महान् पुरुषों ने अच्छे मित्र के यही लक्षण बताये हैं।


सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ।।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैब पापमवाप्स्यसि।। 36।।

हिंदी अर्थ:- हे अर्जुन! सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीत-हार आदि सभी को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। तुम को पाप नहीं लगेगा अर्थात् पापी नहीं कहलाओगे।


ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः |

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||

हिंदी अर्थ:- जो व्यक्ति कर्मफलों को परमेश्वर को समर्पित करके आसक्तिरहित होकर अपना कर्म करता वह पापकर्मों से उसी प्रकार अप्रभावित रहता है, जिस प्रकार कमलपत्र जल से अस्पृश्य रहता है।


उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम।

मोनेन कलहो नास्ति जागृतस्य च न भयम्॥

हिंदी अर्थ:- उद्यम से दरिद्रता तथा जप से पाप दर होता है। मौन रहने से कलह और जागते रहने से भय नहीं होता।


परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।

हिंदी अर्थ:- धर्म है क्या? धर्म है दूसरों की भलाई। यही पुण्य है। और अधर्म क्या है? यह है दूसरों को पीड़ा पहुंचाना। यही पाप है।


न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदो न यज्ञः |

अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।

हिंदी अनुवाद :- न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ….


एक: पापानि कुळते फलं भुङ्क्ते महाजन:।

भोक्ताटो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ॥

हिंदी अर्थ:- व्यक्ति अकेला पाप-कर्म करता है, लेकिन उसके तात्कालिक सुख-लाभ बहुत से लोग उपभोग करते हैं और आनंदित होते हैं। बाद में सुख-भोगी तो पाप-मुक्त हो जाते हैं, लेकिन कर्ता पाप-कर्मों की सजा पाता है।


षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यंयोऽधिगच्छति।

न स पापैः कुतोऽनथैयुज्यते विजितेन्द्रियः ॥

हिंदी अर्थ:- जो व्यक्ति मन में घट बनाकर रहने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार) तथा मात्सर्य (ईष्या) नामक छह शत्रुओं को जीत लेता है, वह जितेंद्रिय हो जाता है। ऐसा व्यक्ति दोषपूर्ण कार्यों, पाप-कर्मों में लिप्त नहीं होता । वह अनर्थों से बचा रहता है।


अनर्थकं विप्रवासं गृहेभ्यः पापैः सन्धि परदाराभिमर्शम् ।

दम्भ स्तैन्य पैशुन्यं मद्यपानं न सेवते यश्च सुखी सदैव ॥

हिंदी अर्थ:- जो व्यक्ति अकाटण घट के बाहट नहीं रहता ,बुटे लोगों की सोहबत से बचता है,परस्त्री से संबध नहीं रखता ;चोटी ,चुगली ,पाखंड और नया नहीं करता -वह सदा सुखी रहता है।


दम्भ मोहं मात्सर्यं पापकृत्यं राजद्धिष्टं पैशुनं पूगवैरम् ।

मत्तोन्मत्तैदुर्जनैश्चापि वादं यः प्रजावान् वर्जयेत् स प्रानः॥

हिंदी अर्थ:- जो व्यक्ति अहंकार, मोह, मत्सर्य (ईघ्या ), पापकर्म, टाजद्रोह, चुगली समाज से वैट -भाव, नशाखोटी, पागल तथा दुष्टों से झगड़ा बंद कर देता है वही बद्धिमान एवं श्रेष्ठ है।


असन्त्यागात् पापकृतामपापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्।

शुष्केणाददह्यते मिश्रभावात्तस्मात् पापैः सह सन्धि नकुर्यात् ॥

हिंदी अर्थ:- दुर्जनों की संगति के कारण निरपराधी भी उन्हीं के समान दंड पाते है जैसे सखी लकड़ियों के साथ गीली भी जल जाती है। इसलिए दुर्जनों का साथ मैत्री नहीं करनी चाहिए।


आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यबुधा बुधान्।

वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते॥

हिंदी अर्थ:- मुर्ख लोग ज्ञानियों को बुटा-भला कहकर उन्हें दुःख पहुँचाते हैं। इस पर भी जानीजन उन्हें माफ कर देते हैं। माफ करने वाला तो पाप से मुक्त हो जाता है और निंदक को पाप लगता है।


असूयको दन्दशूको निष्ठुटो वैरकृच्छठः।

स कृच्छं महदाप्नोति नचिटात् पापमाचरन् ॥

हिंदी अर्थ:- अच्छाई में बुराई देखनेवाले, उपहास उड़ाने वाला, कड़वा बोलने वाला, अत्याचाटी, अन्यायी तथा कुटिल पुरुष पाप कर्मों में लिप्त रहता है और शीघ्र ही मुसीबतों से घिर जाता है।


उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम।

मौनेन कलहो नास्ति जागृतस्य च न भयम्॥

हिंदी अर्थ:- उद्यम करने से दरिद्रता तथा जप करने वाले को पाप, मौन रहने से कलह नहीं होता और जागते रहने से अर्थात सजग रहने से भय नहीं होता।


त्यजेत् क्षुधार्ताः जननी स्वपुत्रं खादेत् क्षुधार्ताः भुजगी स्वमण्डम्।

बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा जनाः निष्करुणा भवन्ति ।।

हिंदी अर्थ:- भूख से व्याकुल एक मां (अपने प्राण बचाने के लिये ) अपने पुत्र को भी त्याग देती है , और एक भूखी सांपिन स्वयं अपने ही अण्डो को खा जाती है। इसी लिये कहा गया है कि एक भूखा व्यक्ति कोई भी पाप (निषिद्ध कार्य) कर सकता है तथा कमजोर व्यक्ति भी ऐसी परिस्थिति में निर्दय हो जाते हैं।


न पर: पापमदत्ते परेषां पापकर्मणाम ।

समयो रक्षितव्यस्तु सन्तश्चारित्रभूषणाः ||

भुक्त्वा तृणानि शुष्कानि पीत्वा तोयं जलाशयात् ।

न हि कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।

अतः श्वः करणीयानि यादद्यैव बुद्धिमान्॥

हिंदी अर्थ:- कोई नहीं जानता है कि कल किसका क्या होगा इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कल करने योग्य कार्य को आज कर कर ले।


पूर्वार्जितानि पापानि नाशमायान्ति यस्य वै।

सत्सङ्गतिर्भवत्तस्य नान्यथा घटते हि सा।।

हिंदी अर्थ:- जिनके पहले किए हुए पाप नष्ट हो गए हैं उन्हें ही सज्जनों से मित्रता होती है । विना पाप नष्ट हुए सत्पुरूषों से मित्रता नहीं होती।


राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठा: पापे पापा: समे समाः ।

राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजा ||

हिंदी अर्थ: - राजा को धर्मात्मा होना चाहिये, पापी राजा के राज्य मे पाप फैल जाता है। प्रजा राजा का ही अनुसरण करती है। जैसा राजा होता है वेसी प्रजा होती है।


लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते।

लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम्।

हिंदी अर्थ: - लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से विषय भोग की इच्छा होती है और लोभ से मोह और नाश होता है, इसलिए लोभ ही पाप की जड़ है।

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