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कन्या पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit shlokas on girl with Hindi meaning

(बेटी) पुत्री कन्या पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit shlokas on girl with Hindi meaning

पुत्री पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

अत्यासन्ने चातिदूरे अत्याढ्ये धनवर्जिते ।

वृत्ति हीने च मूर्खे च कन्यादानं न शस्यते ॥

हिंदी अर्थ:- अत्यंत नज़दीक हो, अत्यंत दूर हो, अति धनवान या अति गरीब हो, उपजीविका का साधन न हो, और मूर्ख हो – इन्हें कन्या नहीं देनी चाहिए ।


मूढाय च विरक्ताय आत्मसंभाविताय च ।

आतुराय प्रमत्ताय कन्यादानं न कारयेत् ॥

हिंदी अर्थ:- मूढ, विरक्त, स्वयं को बडा समज़नेवाला, रोगी, और अविनयी, इनको कन्या नहीं देनी चाहिए ।


कुलं च शीलं च वयश्च रुपम विद्यां च वित्तं च सनाथता च ।

तान् गुणान् सप्त परीक्ष्य देया कन्या बुधैः शेषमचिन्तनीयम् ॥

हिंदी अर्थ:- कुल, शील (शालीनता), आयु, रुप (सुन्दरता), विद्या (योग्यता), द्रव्य (धन), और पालक (पालने वाला) – ये सात बातें ध्यान में रखकर देखकर, अन्य किसी बात का विचार न करके बुद्धिमान मनुष्य को अपनी कन्या (पुत्री) का विवाह करना चाहिए ।


कुग्रामवासः कुलहीन सेवा कुभोजन क्रोधमुखी च भार्या।

पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥

हिंदी अर्थ :- दुष्टों के गावं में रहना, कुलहीन की सेब, कुभोजन, कर्कशा पत्नी, मुर्ख पुत्र तथा विधवा पुत्री ये सब व्यक्ति को बिना आग के जला डालते हैं ।

बेटी पर संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

कन्या वरयते रुपं माता वित्तं पिता श्रुतम्

बान्धवा: कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरेजना:

विवाह के समय कन्या सुन्दर पती चाहती है| उसकी माताजी सधन जमाइ चाहती है। उसके पिताजी ज्ञानी जमाइ चाहते है|तथा उसके बन्धु अच्छे परिवार से नाता जोडना चाहते है। परन्तु बाकी सभी लोग केवल अच्छा खाना चाहते है।

वरयेत्कुलजां प्राज्ञो निरूपामपि कन्यकाम्।

रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥

हिंदी अर्थ:- बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह रूपवती न होने पर भी कुलीन कन्या से विवाह कर ले, किन्तु नीच कुल की कन्या यदि रूपवती तथा सुशील भी हो, तो उससे विवाह न करे । क्योँकि विवाह समान कुल में ही करनी चाहिए ।

सकुले योजयेत्कन्या पुत्रं पुत्रं विद्यासु योजयेत्।

व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत् ॥

हिंदी अर्थ:- कन्या का विवाह किसी अच्छे घर में करनी चाहिए, पुत्र को पढ़ाई-लिखाई में लगा देना चाहिए, मित्र को अच्छे कार्यो में तथा शत्रु को बुराइयों में लगा देना चाहिए । यही व्यवहारिकता है और समय की मांग भी

पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च।

नैव गावं कुमारीं च न वृद्धं न शिशुं तथा॥

हिंदी अर्थ :- आग, गुरु, ब्राह्मण, गाय, कुंआरी कन्या, बूढ़े लोग तथा बच्चों को पावं से नहीं छूना चाहिए । ऐसा करना असभ्यता है क्योंकि ये सभी आदरणीय , पूज्य और प्रिय होते हैं ।

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