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32 life changing Sanskrit Shlokas with meaning in hindi | प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

Sanskrit shlokas with meaning in hindi for students:- संस्कृत भाषा विश्व की सबसे पुरानी भाषा है| हिन्दू धर्म में इसे देव भाषा बोला जाता है| 

The Meaning is, देवताओं ने(सज्जन पुरुष), मनुष्य के लिए एक असाधारण जीवन जीने के लिए जो सूत्र दिए वो इसी भाषा में दिए| ये संस्कृत श्लोक सबके लिए हैं, चाहे वो स्टूडेंट्स हो, kids(बच्चा) हो, गुरु हो|

जीवन में इन सूत्रों को अपना कर हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं| दोस्तों, आईये जानते हैं, कुछ ज्ञान वर्धक sanskrit shlokas with meaning in hindi  in detail.

Sanskrit shlokas with meaning in Hindi | प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

Following are the Sanskrit Shlokas with Hindi Meaning

  आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||

अर्थार्थ:- मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसका आलस्य है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |

अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम
पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

अर्थार्थ:- अपमान करके दान देना, विलंब(देर) से देना, मुख फेर के देना, कठोर वचन बोलना और देने के बाद पश्चाताप करना| ये पांच क्रियाएं दान को दूषित कर देती हैं।

यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि !!

अर्थार्थ:- वह व्यक्ति जो अलग अलग जगहों या देशो में घूमकर (पंडितों) विद्वानों की सेवा करता है, उसकी बुद्धि का विस्तार(विकास) उसी प्रकार होता है, जैसे तेल की बूंद पानी में गिरने के बाद फ़ैल जाती है|

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन|
विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन ||

अर्थार्थ:- कुंडल पहन लेने से कानों की शोभा नहीं बढ़ती, अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है | हाथ, कंगन धारण करने से सुन्दर नहीं होते, उनकी शोभा दान करने से बढ़ती हैं | सज्जनों का शरीर भी चन्दन से नहीं अपितु परहित में किये गये कार्यों से शोभायमान होता हैं।

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्|
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ||

अर्थार्थ:- जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता है उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है|

परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः|
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् !!

अर्थार्थ:- कोई अपरिचित व्यक्ति भी अगर आपकी मदद करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दे और अगर परिवार का कोई अपना सदस्य भी आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दे. ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमारी हो जाए, तो वह हमें तकलीफ पहुंचाती है, जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है|

पुस्तकस्था तु या विद्या,परहस्तगतं च धनम्।
कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् ।।

अर्थार्थ:- पुस्तक में रखी विद्या तथा दूसरे के हाथ में गया धन, ये दोनों ही ज़रूरत के समय हमारे किसी भी काम नहीं आया करते|

sanskrit shlokas with meaning in hindi - संस्कृत श्लोक अर्थ सहित इन हिंदी

विद्या मित्रं प्रवासेषु,भार्या मित्रं गृहेषु च|
व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च ||

अर्थार्थ:- विदेश में ज्ञान, घर में अच्छे स्वभाव और गुणस्वरूपा पत्नी, औषध रोगी का ,तथा धर्म मृतक का सबसे बड़ा मित्र होता है |

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्|
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ||

अर्थार्थ:- अचानक आवेश(जोश) में आ कर बिना सोचे समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए | क्योंकि विवेक हीनता सबसे बड़ी विपत्तियों का कारण होती है | इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है, गुणों से आकृष्ट होने वाली माँ लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है |

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः|
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ||

अर्थार्थ:- जिन मनुष्यों में न विद्या का निवास है, न मेहनत का भाव, न दान की इच्छा, और न ज्ञान का प्रभाव, न गुणों की अभिव्यक्ति और न धर्म पर चलने का संकल्प, वे मनुष्य नहीं, वे मनुष्य रूप में जानवर ही धरती पर विचरते हैं।

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि।
एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते ॥

अर्थार्थ:- बिना दया के किये गए काम का कोई फल नहीं मिलता, ऐसे काम में धर्म नहीं होता| जहाँ दया नही होती वहां वेद भी अवेद बन जाते हैं|

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः|
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् !!

अर्थार्थ:- निम्न कोटि के लोग सिर्फ धन की इच्छा रखते हैं, मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा रखता है, वहीँ एक उच्च कोटि के व्यक्ति के लिए सिर्फ सम्मान ही मायने रखता है, सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है|

Life changing sanskrit shlokas with meaning in hindi for all

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥

अर्थार्थ:- ज्ञान विनम्रता प्रदान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से धन प्राप्त होता है जिससे व्यक्ति धर्म के कार्य करता हैं और सुखी रहता है|

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति|
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ||

अर्थार्थ:- जब तक काम पूरे नहीं होते हैं, तब तक लोग दूसरों की प्रशंसा करते हैं. काम पूरा होने के बाद लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं| ठीक उसी तरह जैसे, नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है.

न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि|
व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्||

अर्थार्थ:- न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न इसका भाइयों के बीच बंटवारा होता है, और न हीं सम्भालना कोई भार है. इसलिए खर्च करने से बढ़ने वाला विद्या रूपी धन, सभी धनों से श्रेष्ठ है|

शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः|
वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा||

अर्थार्थ:- सौ लोगो में एक शूरवीर होता है, हजार लोगो में एक विद्वान होता है, दस हजार लोगो में एक अच्छा वक्ता होता है वही लाखो में बस एक ही दानी होता है|

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थार्थ:- गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही शंकर है, गुरु ही साक्षात परमब्रह्म हैं, ऐसे गुरु का मैं नमन करता हूँ।

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन|
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते||

अर्थार्थ:- एक विद्वान और राजा की कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है|

अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात्।
तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित् ॥

अर्थार्थ:- आग से सींचे गए पेड़ कभी बड़े नहीं होते, उसी प्रकार सत्य के बिना धर्म की स्थापना संभव नहीं है|

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम|
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् !!

अर्थार्थ:- विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता से योग्यता आती है व योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है और सुखी रहते है.

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः|
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा||

अर्थार्थ:- जो माता पिता अपने बच्चो को शिक्षा से वंचित रखते हैं, ऐसे माँ बाप बच्चो के शत्रु के समान है| विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह हंसो के बीच एक बगुले के सामान है|

सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्|
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् !!

अर्थार्थ:- सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ से, और विद्यार्थी को सुख कहाँ से, सुख की इच्छा रखने वाले को विद्या और विद्या की इच्छा रखने वाले को सुख का त्याग कर देना चाहिए

मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम्|
दंपत्यो कलहं नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागतः ॥

अर्थार्थ:- जहाँ मूर्ख को सम्मान नहीं मिलता हो, जहाँ अनाज अच्छे तरीके से रखा जाता हो और जहाँ पति-पत्नी के बीच में लड़ाई नहीं होती हो, वहाँ लक्ष्मी खुद आ जाती है|

Sanskrit shlokas with meaning in hindi on friendship

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

अर्थात:- लोगों की निंदा(बुराई) किये बिना दुष्ट(बुरे) व्यक्तियों को आनंद नहीं आता। जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है परंतु गंदगी के बिना उसकी संतुष्टि नहीं होती ।

नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यं त्वं एव तनुषे चेत।
विश्वस्मिन अधुना अन्य:कुलव्रतम पालयिष्यति क:

अर्थात:- ऐ हंस, यदि तुम दूध और पानी में फर्क करना छोड़ दोगे तो तुम्हारे कुलव्रत का पालन इस विश्व मे कौन करेगा। यदि बुद्धिमान व्यक्ति ही इस संसार मे अपना कर्त्तव्य त्याग देंगे तो निष्पक्ष(impartial)व्यवहार कौन करेगा।

दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति।
नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।

अर्थात:-दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहाकभी भी पेट भरने के लिए कपड़े नहीं काटता।

न कश्चित कस्यचित मित्रं न कश्चित कस्यचित रिपु:|
व्यवहारेण जायन्ते, मित्राणि रिप्वस्तथा।।

अर्थात:- न कोई किसी का मित्र होता है, न कोई किसी का शत्रु। व्यवहार से ही मित्र या शत्रु बनते हैं ।

भूमे:गरीयसी माता,स्वर्गात उच्चतर:पिता।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी।।

अर्थात:- भूमि से श्रेष्ठ माता है, स्वर्ग से ऊंचे पिता हैं, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमतां।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।

अर्थात:- बुद्धिमान लोग काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने में अपना समय व्यतीत करते हैं, जबकि मूर्ख लोग निद्रा,कलह (लड़ाई) और (व्यसनों) बुरी आदतों में अपना समय बिताते हैं।

सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यं प्रियम।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात एष धर्म: सनातन:।।

अर्थात:- सत्य बोलो, प्रिय बोलो,अप्रिय लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।

शैले शैले न माणिक्यं,मौक्तिम न गजे गजे।
साधवो नहि सर्वत्र,चंदन न वने वने।।

अर्थात:- प्रत्येक पर्वत पर अनमोल रत्न नहीं होते, प्रत्येक हाथी के मस्तक में मोती नहीं होता। सज्जन लोग सब जगह नहीं होते और प्रत्येक वन में चंदन नही पाया जाता ।

पृथ्वियां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम सुभाषितं।
मूढ़े: पाधानखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

अर्थात:- पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल,अन्न और शुभ वाणी । पर मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न की संज्ञा देते हैं।


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